₹11 का IV सेट ₹325 में! मेडिकल सामान की कीमतों पर देशभर में सवाल, तुकाराम मुंडे की जांच के बाद केंद्र ने NPPA से मांगी रिपोर्ट

नई दिल्ली। अस्पताल के बिल में दवाइयों और इलाज की बड़ी रकम तो दिखाई देती है, लेकिन इलाज के दौरान इस्तेमाल होने वाले छोटे-छोटे मेडिकल सामान मरीज की जेब पर कितना असर डाल रहे हैं, इस पर अब देशभर में चर्चा शुरू हो गई है। महाराष्ट्र FDA के एक हालिया सर्वे में कुछ मेडिकल कंज्यूमेबल्स की खरीद कीमत और उनकी MRP के बीच कई गुना अंतर सामने आया है।
महाराष्ट्र FDA के कमिश्नर तुकाराम मुंडे ने इस मामले को राष्ट्रीय स्तर पर उठाते हुए केंद्र के फार्मास्यूटिकल्स विभाग और नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (NPPA) के सामने कीमतों की समीक्षा और नियमन की जरूरत बताई। इसके बाद केंद्र ने NPPA से इस मामले में रिपोर्ट मांगी है।
₹11 का सामान ₹325 में, ₹6.75 की सिरिंज ₹57.20
महाराष्ट्र FDA से जुड़े सर्वे में अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाले कई सामान्य मेडिकल कंज्यूमेबल्स की खरीद कीमत और MRP के बीच बड़ा अंतर दर्ज किया गया।
📊 मेडिकल सामान की कीमत में कितना अंतर?
महाराष्ट्र FDA सर्वे में सामने आए प्रमुख उदाहरण
ये आंकड़े महाराष्ट्र FDA के सर्वे से संबंधित रिपोर्टों में सामने आए हैं। खास तौर पर IV सेट का ₹11.05 से ₹325 तक का अंतर सबसे ज्यादा चर्चा में है।
2,841% तक का अंतर कैसे सामने आया?
महाराष्ट्र FDA ने जुलाई 2026 में मुंबई महानगर क्षेत्र, पुणे और छत्रपति संभाजीनगर के अस्पतालों से जुड़े मेडिकल कंज्यूमेबल्स की कीमतों का अध्ययन किया था। इसमें अस्पतालों द्वारा उत्पादों की खरीद कीमत और मरीजों से संबंधित MRP/बिल कीमतों के बीच अंतर देखा गया। रिपोर्ट के अनुसार कुछ मामलों में यह अंतर 150% से लेकर 2,800% से अधिक तक पाया गया।
तुकाराम मुंडे ने कहा है कि उनका विभाग किसी अस्पताल के बिल को सीधे नियंत्रित करने वाला प्राधिकरण नहीं है। उनकी भूमिका सामने आए मूल्य-अंतर को संबंधित केंद्रीय नियामक के सामने रखना है। इसी आधार पर FDA ने NPPA को मामले की समीक्षा के लिए प्रस्ताव भेजा।
अब केंद्र की नजर पूरे सिस्टम पर
मामला महाराष्ट्र तक सीमित रहने के बजाय अब केंद्र के स्तर पर पहुंच गया है। केंद्र ने NPPA से रिपोर्ट मांगी है कि मेडिकल कंज्यूमेबल्स और डिवाइस की खरीद कीमत तथा घोषित MRP में इतने बड़े अंतर की स्थिति क्या है और मौजूदा नियम इसके लिए पर्याप्त हैं या नहीं।
तुकाराम मुंडे ने मेडिकल डिवाइस की कीमतों को अधिक रैशनल, पारदर्शी और निगरानी योग्य बनाने की जरूरत बताई है। उन्होंने अलग-अलग उत्पादों के लिए उचित ट्रेड मार्जिन, बेहतर निगरानी और कुछ जरूरी मेडिकल डिवाइस को अधिक प्रभावी मूल्य नियंत्रण के दायरे में लाने जैसे विकल्पों पर विचार की बात कही है। हालांकि उन्होंने खुद कोई निश्चित प्रतिशत मार्जिन तय नहीं किया है और अंतिम निर्णय सक्षम केंद्रीय प्राधिकरण का होगा।
क्या पूरे देश में मेडिकल सामान इतना ही महंगा बिक रहा है?
यह अभी कहना सही नहीं होगा। महाराष्ट्र FDA का सर्वे राष्ट्रीय स्तर का सर्वे नहीं था। यह महाराष्ट्र के चुनिंदा क्षेत्रों में किया गया अध्ययन था। इसलिए इससे पूरे भारत के हर अस्पताल में समान कीमत या समान मार्जिन होने का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।
लेकिन यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मेडिकल डिवाइस की कीमतों पर केंद्रीय स्तर पर पहले से नियमन मौजूद है, और NPPA कुछ निर्धारित मेडिकल डिवाइस की कीमतों की निगरानी करता है। केंद्र सरकार ने मार्च 2026 में संसद में बताया था कि coronary stents जैसे कुछ उपकरणों पर ceiling price लागू है। वहीं कुछ उपकरणों—जैसे pulse oximeter, BP monitoring machine, nebulizer, digital thermometer और glucometer—पर trade margin rationalisation का प्रावधान लागू किया गया है।
गैर-सूचीबद्ध मेडिकल डिवाइस के मामले में भी मौजूदा व्यवस्था के तहत निर्माता पिछले 12 महीनों की MRP से 10% से अधिक बढ़ोतरी नहीं कर सकते और NPPA को ओवरचार्जिंग की शिकायतों पर कार्रवाई का अधिकार है। हालांकि मार्च 2026 में केंद्र ने यह भी स्पष्ट किया था कि पूरे देश के लिए “One Nation, One Price” या सभी essential medical devices पर एक समान nationwide price cap का कोई प्रस्ताव उस समय विचाराधीन नहीं था।
मरीज के लिए असली सवाल
अस्पताल में भर्ती मरीज आमतौर पर यह नहीं जानता कि इस्तेमाल होने वाला IV सेट, कैनुला, सिरिंज, कैथेटर या अन्य कंज्यूमेबल अस्पताल ने कितने में खरीदा था। ऐसे में खरीद कीमत, MRP और मरीज से वसूली जाने वाली राशि के बीच अंतर कितना उचित है—यही सवाल अब राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बन गया है।
वहीं अस्पताल क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों ने यह भी कहा है कि हर मेडिकल डिवाइस को केवल खरीद कीमत के आधार पर मरीज को उसी कीमत पर देना संभव नहीं माना जा सकता। अस्पतालों को स्टेरिलिटी, स्टोरेज, इमरजेंसी इन्वेंटरी, प्रशिक्षित स्टाफ, गुणवत्ता, एक्सपायरी और मरीज की सुरक्षा जैसी लागत भी वहन करनी पड़ती है। इसलिए खरीद कीमत और मरीज से ली गई अंतिम कीमत के अंतर को समझने के लिए पूरे सप्लाई और सेवा ढांचे को देखना जरूरी है।
अब केंद्र की रिपोर्ट और NPPA की समीक्षा पर नजर है। अगर नियामक जांच में ऐसे अंतर व्यापक स्तर पर पाए जाते हैं, तो मेडिकल कंज्यूमेबल्स की कीमतों और अस्पताल बिलिंग में पारदर्शिता को लेकर नए नियमों की दिशा खुल सकती है।





