1076 की सफलता या प्रशासनिक जवाबदेही पर बड़ा सवाल?

संपादकीय | सवाल व्यवस्था का
सरकार ने एक किसान को समय पर खाद मिलने की कहानी को मुख्यमंत्री हेल्पलाइन 1076 की सफलता के रूप में प्रस्तुत किया है। निस्संदेह, किसी नागरिक की शिकायत का समाधान होना स्वागतयोग्य है। लेकिन इस घटना का दूसरा पक्ष कहीं अधिक महत्वपूर्ण है, जिस पर चर्चा होना आवश्यक है।
किसान ने सभी औपचारिकताएं पूरी कर दी थीं। दस्तावेज जमा किए, बायोमेट्रिक सत्यापन कराया, फिर भी उसे खाद नहीं मिली। आखिर क्यों? यदि शिकायत दर्ज होने के बाद एक सप्ताह के भीतर वही खाद उपलब्ध हो सकती थी, तो पहले क्यों नहीं हुई? क्या संबंधित अधिकारी अपने दायित्व का निर्वहन कर रहे थे या उन्हें काम करने के लिए मुख्यमंत्री हेल्पलाइन की घंटी बजने का इंतजार था?
यहीं से शुरू होता है प्रशासनिक जवाबदेही का प्रश्न।
1076 जैसी हेल्पलाइन किसी भी लोकतांत्रिक शासन में नागरिकों के लिए सुरक्षा कवच होती है। लेकिन यदि यह व्यवस्था रोजमर्रा के सामान्य सरकारी कार्यों को करवाने का माध्यम बन जाए, तो यह स्थानीय प्रशासन की कार्यशैली पर गंभीर प्रश्नचिह्न है। ऐसी स्थिति में हेल्पलाइन की उपलब्धि जितनी दिखाई देती है, उतनी ही स्थानीय प्रशासन की निष्क्रियता भी उजागर होती है।
इस घटना ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—क्या अब आम नागरिक को हर वैधानिक कार्य के लिए पहले शिकायत दर्ज करानी होगी? क्या बिना शिकायत के सरकारी कार्यालयों में काम नहीं होगा? यदि ऐसा है, तो फिर नियमित प्रशासनिक व्यवस्था का उद्देश्य क्या रह जाता है?
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि शिकायत का समाधान ही पर्याप्त नहीं है। यदि जांच में यह स्पष्ट होता है कि किसी अधिकारी या कर्मचारी की लापरवाही, उदासीनता या अनावश्यक विलंब के कारण नागरिक को 1076 तक पहुंचना पड़ा, तो केवल शिकायत बंद कर देना समाधान नहीं माना जा सकता। ऐसी स्थिति में संबंधित अधिकारी की जवाबदेही तय होनी चाहिए और आवश्यकतानुसार दंडात्मक कार्रवाई भी होनी चाहिए। तभी प्रशासन में कार्य संस्कृति विकसित होगी और शिकायतों की संख्या स्वाभाविक रूप से घटेगी।
सुशासन का अर्थ केवल शिकायतों का निस्तारण नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था स्थापित करना है जहां शिकायत पैदा ही न हो। यदि हर छोटी-बड़ी समस्या का समाधान मुख्यमंत्री हेल्पलाइन से ही होना है, तो यह स्थानीय प्रशासन की दक्षता पर प्रश्न खड़ा करता है।
1076 निश्चित रूप से एक प्रभावी व्यवस्था है, लेकिन इसकी वास्तविक सफलता तब मानी जाएगी जब इस पर आने वाली शिकायतों की संख्या लगातार कम हो, क्योंकि अधिकारी बिना शिकायत के ही अपने दायित्व निभा रहे हों। यदि शिकायतों का निराकरण तो हो रहा है, लेकिन शिकायतें पैदा करने वाली लापरवाही पर कोई कार्रवाई नहीं होती, तो यह व्यवस्था केवल लक्षणों का इलाज करेगी, बीमारी का नहीं।
सरकार को चाहिए कि 1076 में प्राप्त शिकायतों को केवल समाधान के आंकड़ों तक सीमित न रखे, बल्कि उन्हें प्रशासनिक प्रदर्शन का पैमाना भी बनाए। जिस विभाग या अधिकारी के विरुद्ध बार-बार शिकायतें सही पाई जाएं, वहां जवाबदेही तय हो। तभी 1076 केवल शिकायत निवारण का मंच नहीं, बल्कि प्रशासनिक सुधार का सबसे प्रभावी माध्यम बन सकेगी।
आखिरकार, किसी भी सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि यह नहीं कि शिकायत का समाधान कितनी जल्दी हुआ; बल्कि यह है कि नागरिक को शिकायत दर्ज कराने की नौबत ही न आए।



