
तालपुर में 4.75 एकड़ शासकीय भूमि पर कथित कब्जे का मामला; 5 पटवारी और 2 राजस्व निरीक्षकों की टीम भी अब तक नहीं दे सकी रिपोर्ट
कवर्धा। सरकारी जमीन किसकी है—जनता की या जमीन के कारोबारियों की? कवर्धा के ग्राम तालपुर में शासकीय नाले की भूमि पर कथित कब्जे और प्लॉटिंग की शिकायत ने राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। शिकायत के करीब एक महीने बाद भी जांच रिपोर्ट सामने नहीं आई है। पांच पटवारी और दो राजस्व निरीक्षकों की टीम गठित होने के बावजूद कार्रवाई की स्थिति स्पष्ट नहीं है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि सरकारी जमीन की सीमा तय करने और नाले को सुरक्षित रखने में आखिर देरी क्यों हो रही है?

मामले में युवा कांग्रेस के प्रदेश सचिव आकाश केशरवानी ने शिकायत कर आरोप लगाया है कि ग्राम तालपुर में शासकीय नाले की भूमि पर प्लॉटिंग की गई और जमीन का विक्रय भी हुआ है। शिकायत के बाद तहसीलदार कवर्धा ने सात सदस्यीय जांच टीम बनाई थी। लेकिन एक माह बाद भी प्रतिवेदन सामने नहीं आने से जांच की गति और प्रशासन की गंभीरता पर सवाल उठ रहे हैं।
सरकारी नाले की जमीन पर किसका कब्जा?
शिकायत के अनुसार, खसरा नंबर 86 में 1.9140 हेक्टेयर यानी करीब 4.73 एकड़ शासकीय भूमि दर्ज है। इस भूमि पर नाला होने की बात कही गई है। वहीं, उपलब्ध जानकारी में खसरा नंबर 86 में 4 एकड़ 75 डिसमिल और खसरा नंबर 78 में 1 एकड़ 20 डिसमिल नाले की भूमि दर्ज होने का भी उल्लेख है। इन रकबों और अभिलेखों का आधिकारिक सत्यापन जरूरी है।

सबसे अहम सवाल यही है कि राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज नाले की जमीन की वर्तमान स्थिति क्या है? क्या उसका सीमांकन किया गया है? क्या नाले की भूमि पर प्लॉट काटे गए हैं या उसका कोई हिस्सा निजी भूमि बताकर बेचा गया है? इन सवालों का जवाब सीमांकन, राजस्व अभिलेखों और विक्रय दस्तावेजों की जांच से ही सामने आ सकता है। जब तक प्रशासन वास्तविक स्थिति स्पष्ट नहीं करता, तब तक सरकारी जमीन की सुरक्षा को लेकर सवाल बने रहेंगे।
दर्जनों खसरों में प्लॉटिंग, वैधता की जांच जरूरी
तालपुर में खसरा नंबर 82/201, 82/178, 95, 96/1, 96/11, 96/3, 92/11 और 80/1 सहित कई खसरों में प्लॉट काटे जाने की जानकारी सामने आई है। अब इन जमीनों की सीमाएं, स्वामित्व और प्लॉटिंग की वैधानिक स्थिति जांच के दायरे में आनी चाहिए।
सिर्फ प्लॉट कटने या जमीन बिकने से अवैधता साबित नहीं होती, लेकिन यदि प्लॉटिंग के दौरान शासकीय नाले की भूमि पर कब्जा किया गया है या प्राकृतिक जल निकासी का रास्ता बाधित किया गया है, तो यह गंभीर मामला है। प्रशासन को प्रत्येक संबंधित खसरे का रिकॉर्ड खंगालकर स्पष्ट करना चाहिए कि नाले की जमीन कहां तक है और उस पर किसी तरह का अतिक्रमण हुआ है या नहीं।
सड़क पर जलभराव, नाले की स्थिति पर सवाल
तालपुर क्षेत्र में रायपुर से बिलासपुर-जबलपुर जाने वाले राष्ट्रीय मार्ग पर पेट्रोल पंप से ट्रैक्टर शोरूम तक बारिश के दौरान जलभराव होने की समस्या भी सामने आई है। पानी जमा होने से वाहन चालकों और राहगीरों को परेशानी होती है। सड़क को नुकसान पहुंचने की आशंका भी बनी रहती है।
स्थानीय स्तर पर नाले की चौड़ाई, बहाव और जल निकासी मार्ग को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। हालांकि, जलभराव का कारण अतिक्रमण ही है, यह जांच के बिना नहीं कहा जा सकता। इसके लिए नाले का सीमांकन, स्थल निरीक्षण और जल निकासी व्यवस्था की तकनीकी जांच जरूरी है। यदि नाले का रास्ता कहीं संकरा या बाधित मिला, तो जिम्मेदारी तय कर उसे बहाल करना प्रशासन की प्राथमिकता होनी चाहिए।
सात सदस्यीय टीम, फिर भी रिपोर्ट का इंतजार
इस मामले में पांच पटवारी और दो राजस्व निरीक्षकों की जांच टीम गठित की गई थी। इसके बावजूद करीब एक महीने बाद भी जांच प्रतिवेदन सामने नहीं आने से प्रशासनिक जवाबदेही पर सवाल उठ रहे हैं। क्या स्थल निरीक्षण पूरा हुआ? क्या संबंधित खसरों का सीमांकन किया गया? क्या विक्रय दस्तावेजों और प्लॉटिंग की अनुमतियों की जांच हुई? यदि जांच पूरी नहीं हुई है, तो देरी का कारण क्या है?
शासकीय नाले की जमीन किसी व्यक्ति की निजी संपत्ति नहीं, बल्कि सार्वजनिक हित और जल निकासी से जुड़ा महत्वपूर्ण संसाधन है। इस मामले में प्रशासन को शिकायत की स्थिति स्पष्ट करते हुए जांच की समय-सीमा बतानी चाहिए। यदि सरकारी भूमि पर अतिक्रमण या अवैध प्लॉटिंग प्रमाणित होती है, तो नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए। साथ ही नाले की मूल सीमा और जल निकासी मार्ग सुरक्षित करने के लिए ठोस कदम उठाए जाने चाहिए।
अब निगाहें राजस्व विभाग की जांच रिपोर्ट पर हैं। तालपुर में सरकारी नाले की जमीन की वास्तविक स्थिति क्या है, प्लॉटिंग नियमों के अनुरूप हुई है या नहीं और जलभराव की समस्या के पीछे क्या कारण हैं—इन सवालों का जवाब रिकॉर्ड आधारित जांच और प्रशासनिक कार्रवाई से ही मिलेगा।





