परीक्षा दे रहे बच्चों पर गिरा छत का प्लास्टर: तीन घायल, एक गंभीर; सवाल—जर्जर स्कूलों पर सरकारी दावे आखिर जमीन पर कितने सुरक्षित?

दुर्ग। जिस कमरे में बच्चे परीक्षा देकर अपना भविष्य लिख रहे थे, उसी कमरे की छत का प्लास्टर अचानक उनके ऊपर आ गिरा। दुर्ग जिले के रसमड़ा क्षेत्र के गनियारी शासकीय हाईस्कूल में मंगलवार को त्रैमासिक परीक्षा के दौरान हुए हादसे में 10वीं कक्षा के तीन विद्यार्थी घायल हो गए। इनमें छात्रा द्रौपदी ठाकुर के सिर में गंभीर चोट आई और उन्हें जिला अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा, जहां सिर पर तीन टांके लगाए गए। हादसे के समय कमरे में करीब 50 विद्यार्थी परीक्षा दे रहे थे।
यह केवल एक कमरे से प्लास्टर गिरने की घटना नहीं है। यह उस सवाल को फिर सामने लाती है कि सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की सुरक्षा की जिम्मेदारी कागजों में कितनी मजबूत है और जमीन पर कितनी?
हादसे के बाद जांच, लेकिन सवाल पहले से बड़ा
घटना के बाद जिला शिक्षा अधिकारी ने जांच दल स्कूल भेजा है। जांच में यह देखा जाएगा कि भवन की स्थिति पहले से खराब थी या नहीं और मरम्मत अथवा सुरक्षा को लेकर पहले कोई शिकायत हुई थी या नहीं।
लेकिन इसी सवाल के बीच शिक्षा विभाग का अपना रिकॉर्ड भी महत्वपूर्ण हो जाता है।

23 जून को स्कूल शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव ने अधिकारियों की बैठक में जर्जर स्कूल भवनों की सूची तैयार करने, जरूरी मरम्मत कराने और बेहद जर्जर भवनों को चरणबद्ध तरीके से डिस्मेंटल करने के निर्देश दिए थे। साथ ही स्कूलों में आवश्यक मरम्मत कार्यों के समयबद्ध और गुणवत्तापूर्ण उपयोग पर जोर दिया गया था।
इसके तीन महीने के भीतर परीक्षा दे रहे बच्चों के ऊपर छत का हिस्सा गिरना बताता है कि निर्देश जारी होने और उनकी जमीन पर निगरानी के बीच अभी भी बड़ा अंतर हो सकता है।
यह पहली चेतावनी भी नहीं
दुर्ग की घटना से कुछ दिन पहले महासमुंद जिले के बागबाहरा विकासखंड के हरनादादर स्थित शंकरपारा प्राथमिक स्कूल में जर्जर भवन की छत पर लगा पंखा प्रधानपाठक के ऊपर गिर गया था। शिक्षक के सिर और नाक पर चोट आई। इसके बाद बच्चों को सुरक्षित स्थान के रूप में आंगनबाड़ी केंद्र में शिफ्ट किया गया। एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक उस भवन में पहली से पांचवीं तक के 18 बच्चे पढ़ रहे थे।
यानी सवाल सिर्फ यह नहीं है कि प्लास्टर क्यों गिरा? सवाल यह भी है कि जर्जर भवनों की पहचान होने के बाद उन्हें बच्चों के लिए सुरक्षित घोषित करने की व्यवस्था कितनी प्रभावी है।
विभाग कहता है—हजारों काम हुए, फिर खतरा क्यों?
21 अगस्त को शिक्षा मंत्री ने विभाग के दो वर्षों के कामकाज का लेखा-जोखा प्रस्तुत करते हुए बताया था कि पिछले तीन वर्षों में 504 नए विद्यालयों की स्वीकृति दी गई है। 2026-27 के बजट में 700 भवनविहीन विद्यालयों के लिए प्रावधान और 2023 से 2026 के बीच 2,583 अतिरिक्त कक्षों की स्वीकृति की जानकारी दी गई।
इसी प्रस्तुति में विद्यालयों के शौचालय निर्माण और मरम्मत के लिए ₹52.39 करोड़ की राशि स्वीकृत होने तथा 302 शौचालयों का निर्माण पूरा होने की बात भी कही गई थी।
ये आंकड़े सरकारी स्तर पर किए जा रहे इंफ्रास्ट्रक्चर प्रयास दिखाते हैं। लेकिन गनियारी की घटना के बाद असली सवाल यह है कि इन योजनाओं और स्वीकृतियों का असर उन पुराने भवनों तक कब पहुंचेगा, जहां बच्चे आज भी बैठकर पढ़ रहे हैं?
प्रदेश में पहले भी सामने आई है जर्जर स्कूलों की तस्वीर
2025 में प्रकाशित एक रिपोर्ट में राज्य के करीब 8,106 सरकारी स्कूल भवनों को जर्जर बताया गया था, जिनमें 3,789 भवन बेहद खराब स्थिति में बताए गए थे। उस समय शिक्षा विभाग ने जर्जर भवनों की तत्काल मरम्मत और बेहद खराब भवनों में कक्षाएं नहीं लगाने के निर्देश दिए थे।
हालांकि यह आंकड़ा 2025 की स्थिति से जुड़ा है, इसलिए इसे आज के जर्जर भवनों की संख्या नहीं माना जा सकता। लेकिन इससे यह जरूर स्पष्ट होता है कि समस्या नई नहीं है।
2026 में भी अलग-अलग जिलों से तस्वीरें सामने आती रहीं। रायगढ़ में 200 से अधिक जर्जर स्कूल भवनों का मामला सामने आया और कुछ स्कूलों को पंचायत या सामुदायिक भवनों में संचालित करने की स्थिति बनी।
तखतपुर में जर्जर स्कूल भवन के कारण बच्चों को पेड़ के नीचे पढ़ाने की स्थिति भी सामने आई थी।
बच्चों की सुरक्षा पर ‘जीरो रिस्क’ कब?
सरकारी स्कूल में पढ़ने वाला बच्चा किसी निजी सुविधा का लाभार्थी नहीं, बल्कि राज्य की शिक्षा व्यवस्था की जिम्मेदारी है।
परीक्षा के दौरान छत का प्लास्टर गिरना इस बात की याद दिलाता है कि स्कूल की गुणवत्ता केवल स्मार्ट क्लास, डिजिटल उपस्थिति, नए पाठ्यक्रम या परीक्षा परिणाम से नहीं मापी जा सकती।
सबसे पहला सवाल होना चाहिए—
जिस कमरे में बच्चा बैठा है, क्या वह कमरा उसके लिए सुरक्षित है?
गनियारी की घटना में बड़ा हादसा टल गया। तीन बच्चे घायल हुए और एक बच्ची को सिर में टांके लगे। लेकिन अगली बार प्लास्टर का टुकड़ा थोड़ा बड़ा हुआ, छत का हिस्सा ज्यादा गिरा या बच्चे ज्यादा संख्या में उसके नीचे हुए तो परिणाम कहीं गंभीर हो सकता है।
इसलिए अब जरूरत केवल जांच दल भेजने की नहीं, बल्कि प्रदेश के सभी जर्जर स्कूल भवनों का सार्वजनिक सुरक्षा ऑडिट कराने की है।
क्योंकि शिक्षा का पहला पाठ किताब से नहीं, सुरक्षित छत के नीचे शुरू होता है।





