
कवर्धा। नगर पालिका में भवन अनुज्ञा के नाम पर कथित रिश्वत मांगने और फाइल लंबित रखने की शिकायत के बाद संबंधित लिपिक का सेक्शन बदल दिया गया है। हालांकि, शिकायत में नामित उप अभियंता शिव गर्ग की भूमिका पर अब तक किसी जांच या कार्रवाई की जानकारी सामने नहीं आई है।
शिकायतकर्ता ने कलेक्टर एवं जिला दंडाधिकारी कबीरधाम को शिकायत देकर भवन अनुज्ञा जारी करने के लिए पैसे मांगने, फाइल में बार-बार कमियां निकालकर प्रक्रिया रोकने और एफडीआर वापसी में कमीशन मांगने के आरोप लगाए थे।
क्या हैं आरोप?
शिकायतकर्ता के अनुसार, आवासीय भवन अनुज्ञा की फाइल के संबंध में पहले 2 हजार रुपए दिए जा चुके थे। इसके बावजूद फाइल आगे बढ़ाने के लिए कथित रूप से 3 हजार रुपए की मांग की गई। रकम नहीं देने पर नई-नई कमियां बताकर प्रक्रिया लंबित रखने, रात में बुलाने और नोटिस जारी करने की धमकी देने का आरोप लगाया गया है।
शिकायत में अजय कुमार और मनोहर सिंह के रेन वाटर हार्वेस्टिंग से जुड़े एफडीआर वापसी आवेदनों का भी उल्लेख है। आरोप है कि आवेदन के करीब एक माह बाद भी स्थल निरीक्षण और आगे की प्रक्रिया नहीं की गई। एफडीआर की 30 प्रतिशत राशि में से कथित कमीशन मांगने और मानचित्रकार पंजीयन नवीनीकरण के लिए 2 हजार रुपए मांगने की बात भी कही गई है।

जांच और जवाबदेही पर सवाल
लिपिक का सेक्शन बदलना शिकायत के बाद हुई पहली कार्रवाई है, लेकिन इससे मूल आरोपों की जांच पूरी नहीं होती। शिकायत में उप अभियंता शिव गर्ग की भूमिका पर सवाल उठाए गए हैं, इसलिए संबंधित फाइलों, एफडीआर आवेदनों और अधिकारियों-कर्मचारियों की भूमिका की निष्पक्ष जांच जरूरी है।
जांच के दौरान शिकायतकर्ता के आरोप की जाँच और लंबित भवन अनुज्ञा के फाइलों की जाँच किए जाने चाहिए। आरोप सही पाए जाने पर जिम्मेदारी तय कर नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए।
प्रक्रिया में पारदर्शिता की जरूरत
भवन अनुज्ञा प्रक्रिया में लिपिक, तकनीकी अधिकारी और स्वीकृति देने वाले स्तर शामिल होते हैं। इसलिए केवल प्रभार बदलने से व्यवस्था में पारदर्शिता नहीं आएगी। आवेदकों को फाइल की स्थिति, आपत्तियों और आवश्यक दस्तावेजों की जानकारी लिखित रूप से दी जानी चाहिए। आवेदन की समय-सीमा तय हो और अनावश्यक देरी के लिए जिम्मेदारी निर्धारित की जाए।
नगर पालिका को भवन अनुज्ञा प्रक्रिया की जानकारी ऑनलाइन या सूचना पटल पर उपलब्ध करानी चाहिए। कमियों की जानकारी एक ही बार में दी जाए और शिकायतों की जांच को केवल स्थानांतरण या प्रभार परिवर्तन तक सीमित न रखा जाए।
खबर के बाद लिपिक का प्रभार बदलना प्रशासन की प्रारंभिक कार्रवाई है। अब यह देखना होगा कि शिकायत में नामित उप अभियंता की भूमिका की भी निष्पक्ष जांच होती है या मामला केवल प्रभार परिवर्तन तक सीमित रह जाता है।





