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POCSO केस में स्कूल रिकॉर्ड की जन्मतिथि पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: मूल आधार साबित नहीं हुआ तो उम्र निर्णायक नहीं; आरोपी बरी

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने POCSO से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि केवल स्कूल के प्रवेश रजिस्टर में दर्ज जन्मतिथि के आधार पर किसी पीड़िता की उम्र को निर्णायक रूप से साबित नहीं माना जा सकता, यदि उस जन्मतिथि की प्रविष्टि का मूल आधार या स्रोत अभियोजन पक्ष साबित नहीं कर पाए।

मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविन्द्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने आरोपी की दोषसिद्धि और सजा को रद्द करते हुए उसे सभी आरोपों से बरी कर दिया। अदालत ने माना कि अभियोजन यह साबित करने में विफल रहा कि घटना के समय पीड़िता 18 वर्ष से कम उम्र की थी।

ट्रायल कोर्ट ने सुनाई थी सजा

यह मामला जांजगीर-चांपा जिले की विशेष POCSO अदालत से जुड़ा था। ट्रायल कोर्ट ने 5 सितंबर 2023 को आरोपी को IPC की धारा 363, 366 और POCSO एक्ट की धारा 6 के तहत दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई थी।

इस फैसले के खिलाफ आरोपी ने हाईकोर्ट में अपील की। हाईकोर्ट ने मामले में सबसे पहले यह जांचा कि घटना के समय कथित पीड़िता वास्तव में नाबालिग थी या नहीं।

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स्कूल रजिस्टर में दर्ज थी जन्मतिथि

अभियोजन पक्ष ने पीड़िता की उम्र साबित करने के लिए स्कूल के प्रवेश रजिस्टर और प्रोग्रेस रिपोर्ट पर भरोसा किया था। स्कूल रजिस्टर में उसकी जन्मतिथि दर्ज थी।

अदालत में स्कूल की शिक्षिका ने रजिस्टर पेश किया, लेकिन जिरह के दौरान यह सामने आया कि रजिस्टर में जन्मतिथि दर्ज करने का आधार क्या था, इसकी जानकारी उनके पास नहीं थी। रजिस्टर में जन्मतिथि के समर्थन में कोई अन्य दस्तावेज भी संलग्न नहीं था।

कोर्ट ने कहा- दस्तावेज साबित करना और उसकी सामग्री साबित करना अलग

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा कि किसी दस्तावेज को अदालत में पेश कर देना या उसे रिकॉर्ड पर प्रदर्शित कर देना पर्याप्त नहीं है। उसमें दर्ज तथ्य की सत्यता भी कानून के मुताबिक साबित करनी होती है।

अदालत ने Alamelu बनाम State सहित सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला दिया। इनमें कहा गया है कि स्कूल रिकॉर्ड उम्र का एक स्वीकार्य दस्तावेज हो सकता है, लेकिन उसकी जन्मतिथि की विश्वसनीयता पर सवाल होने पर उस प्रविष्टि का आधार और उसे दर्ज करने वाले व्यक्ति की जानकारी महत्वपूर्ण हो जाती है।

जन्म प्रमाण पत्र भी पेश नहीं किया गया

हाईकोर्ट ने पाया कि अभियोजन ने स्कूल रिकॉर्ड के अलावा पीड़िता की उम्र साबित करने के लिए कोई जन्म प्रमाण पत्र या अन्य ठोस प्राथमिक दस्तावेज पेश नहीं किया।

मामले में पीड़िता ने भी अपनी जन्मतिथि स्कूल रिकॉर्ड के आधार पर बताई थी। वहीं उसकी मां ने जन्मतिथि के संबंध में जानकारी दी, लेकिन जिस मूल रिकॉर्ड के आधार पर स्कूल में जन्मतिथि दर्ज की गई थी, उसका प्रमाण अदालत के सामने नहीं आया।

सिर्फ स्कूल रिकॉर्ड से नाबालिग साबित नहीं हुई

डिवीजन बेंच ने कहा कि इस मामले में स्कूल रजिस्टर में दर्ज जन्मतिथि की प्रविष्टि का आधार प्रमाणित नहीं होने के कारण अभियोजन यह साबित नहीं कर सका कि घटना के समय पीड़िता 18 वर्ष से कम उम्र की थी।

अदालत ने स्पष्ट किया कि आपराधिक मामले में अभियोजन पर आरोपों को संदेह से परे साबित करने का भार होता है। जब उम्र को लेकर ही उचित संदेह मौजूद हो और POCSO के लिए आवश्यक नाबालिग होने की स्थिति साबित न हो पाए, तो आरोपी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का भी लिया सहारा

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के Alamelu, Birad Mal Singhvi, Rishipal Singh Solanki और P. Yuvaprakash जैसे फैसलों का उल्लेख किया।

अदालत ने उम्र निर्धारण से जुड़े कानूनी सिद्धांतों को देखते हुए कहा कि दस्तावेज उपलब्ध होने मात्र से उसमें दर्ज प्रत्येक तथ्य स्वतः सत्य साबित नहीं हो जाता। खासकर आपराधिक मुकदमे में अभियोजन को उस तथ्य को विश्वसनीय साक्ष्य से साबित करना होता है, जिस पर आरोपी की दोषसिद्धि निर्भर करती है।

पीड़िता के बयान और परिस्थितियों पर भी विचार

अदालत ने केवल उम्र से जुड़े दस्तावेज ही नहीं, बल्कि पीड़िता की गवाही और घटना के बाद की परिस्थितियों को भी देखा।

फैसले में दर्ज तथ्यों के अनुसार पीड़िता आरोपी के साथ अपनी इच्छा से घर से निकली और दोनों कुछ समय तक पुणे में साथ रहे। अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों और गवाही में सामने आई परिस्थितियों को भी आरोपी के पक्ष में माना।

अभियोजन आरोप साबित नहीं कर पाया

हाईकोर्ट ने पूरे मामले के साक्ष्यों का मूल्यांकन करने के बाद निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोपों को संदेह से परे साबित करने में सफल नहीं रहा।

अदालत ने कहा कि पीड़िता के 18 वर्ष से कम उम्र की होने का पर्याप्त और विश्वसनीय प्रमाण नहीं है। ऐसे में POCSO एक्ट के तहत दोषसिद्धि कायम नहीं रखी जा सकती।

दोषसिद्धि और सजा रद्द, आरोपी बरी

डिवीजन बेंच ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को निरस्त करते हुए आरोपी को सभी आरोपों से बरी कर दिया। फैसले के समय आरोपी जेल में था और हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि यदि किसी अन्य मामले में उसकी आवश्यकता नहीं है तो उसे तत्काल रिहा किया जाए।

साथ ही अदालत ने आरोपी को निर्धारित शर्तों के साथ व्यक्तिगत बांड और जमानतदार प्रस्तुत करने का निर्देश भी दिया।

कोर्ट के फैसले का अहम संदेश

इस फैसले का मतलब यह नहीं है कि POCSO मामलों में स्कूल रिकॉर्ड की जन्मतिथि को कभी स्वीकार नहीं किया जा सकता। अदालत का जोर इस बात पर है कि जिस जन्मतिथि को अभियोजन उम्र साबित करने के लिए आधार बना रहा है, उसकी विश्वसनीयता और रिकॉर्ड में दर्ज होने का आधार मामले के तथ्यों के अनुसार साबित होना चाहिए।

इस मामले में हाईकोर्ट ने पाया कि जन्मतिथि की प्रविष्टि के मूल आधार को पर्याप्त रूप से साबित नहीं किया गया। इसी कारण उम्र को लेकर संदेह पैदा हुआ और आरोपी को आपराधिक कानून के तहत संदेह का लाभ मिला।

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रुपेश चन्द्रवंशी

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लेखक/संपादक BJMC (Bachelor of Journalism & Mass Communication) डिग्रीधारी एवं 12 वर्षों से अधिक के मीडिया अनुभव के साथ पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इस दौरान प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और वेब मीडिया में पत्रकारिता से जुड़े विभिन्न दायित्वों का निर्वहन किया है।

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