छत्तीसगढ़ प्रादेशिक

सरकारी दफ्तरों में प्रीपेड बिजली लागू: 3 हजार करोड़ का बकाया, 39 कनेक्शन कटे; क्या अब आम जनता की आएगी बारी?

रायपुर। छत्तीसगढ़ में सरकारी दफ्तरों की बिजली व्यवस्था अब मोबाइल रिचार्ज की तरह प्रीपेड की जा रही है। 1 अगस्त 2026 से सरकारी कार्यालयों में प्रीपेड बिजली बिलिंग व्यवस्था लागू करने का फैसला लिया गया है। इसका मकसद सरकारी विभागों पर लगातार बढ़ रहे बिजली बिल के बकाये को रोकना और बिजली खर्च पर नियंत्रण रखना है।

इस फैसले के बाद आम बिजली उपभोक्ताओं के बीच भी सवाल उठने लगा है कि क्या अब घरों में भी बिजली पहले रिचार्ज करानी होगी और फिर बिजली मिलेगी?

फिलहाल इसका जवाब नहीं है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार आम घरेलू उपभोक्ताओं के लिए पूरे राज्य में अनिवार्य प्रीपेड बिजली व्यवस्था लागू करने की कोई घोषित तारीख या निर्णय सामने नहीं आया है।

पहले समझिए- सरकारी दफ्तरों में क्या बदला है?

नई व्यवस्था में सरकारी कार्यालयों को बिजली इस्तेमाल करने से पहले निर्धारित राशि उपलब्ध करानी होगी। यानी पहले बिजली का इस्तेमाल और बाद में महीनों तक बिल लंबित रखने की व्यवस्था को खत्म करने की कोशिश है।

सरकार ने इसे चरणबद्ध तरीके से लागू करने का फैसला किया है। पहले चरण में ब्लॉक स्तर और उससे ऊपर के सरकारी कार्यालयों को शामिल किया गया है। इसके बाद निचले स्तर के कार्यालयों को भी व्यवस्था से जोड़ने की योजना है।

सरकारी विभागों के लिए पुराने बकाये को अलग रखा गया है। रिपोर्टों के अनुसार जून 2026 तक सरकारी विभागों पर बिजली कंपनी का बकाया करीब 3,432 करोड़ रुपए तक पहुंच गया था। इस पुराने बकाये के भुगतान के लिए अलग व्यवस्था बनाई गई है।

बकाया नहीं चुकाया तो क्या होगा?

नई व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य ही यह है कि भविष्य में सरकारी विभागों का बिजली बिल बकाया न बढ़े।

प्रीपेड खाते में उपलब्ध राशि के आधार पर बिजली की खपत होगी। बैलेंस कम होने पर संबंधित विभाग को रिचार्ज के लिए अलर्ट भेजने की व्यवस्था है। उपलब्ध दिशा-निर्देशों के अनुसार नोडल अधिकारी को SMS और WhatsApp के जरिए बैलेंस खत्म होने से पहले सूचना दी जाएगी।

इसका मतलब यह है कि सरकारी विभाग को पहले से अपने बिजली खर्च का बजट रखना होगा। पैसा उपलब्ध नहीं होने पर बिजली आपूर्ति प्रभावित होने की स्थिति बन सकती है।

क्या यह सरकार का ‘ट्रायल’ है?

यहां सबसे ज्यादा भ्रम है।

आधिकारिक तौर पर इसे ‘ट्रायल’ या ‘पायलट प्रोजेक्ट’ नहीं कहा गया है।

सरकार ने सरकारी कार्यालयों में इसे चरणबद्ध तरीके से लागू करने का फैसला किया है। इसलिए खबर में इसे आम जनता के लिए प्रीपेड बिजली का ट्रायल कहना सही नहीं होगा।

हालांकि, सरकारी दफ्तरों में व्यवस्था लागू होने के बाद सरकार और बिजली कंपनी को प्रीपेड सिस्टम के संचालन का व्यावहारिक अनुभव जरूर मिलेगा। लेकिन इससे यह निष्कर्ष निकालना कि अब जल्द ही हर घरेलू कनेक्शन प्रीपेड हो जाएगा, अभी सही नहीं होगा।

स्मार्ट मीटर और प्रीपेड मीटर एक ही हैं?

नहीं। दोनों में अंतर है।

स्मार्ट मीटर डिजिटल तरीके से बिजली की खपत रिकॉर्ड करता है और बिजली कंपनी को मीटर की रीडिंग दूर से प्राप्त करने में मदद करता है।

वहीं प्रीपेड बिलिंग में उपभोक्ता पहले राशि जमा करता है और उपलब्ध बैलेंस के आधार पर बिजली का इस्तेमाल करता है।

यानी:

स्मार्ट मीटर = मीटर की तकनीक

प्रीपेड = बिजली भुगतान का तरीका

एक स्मार्ट मीटर को प्रीपेड मोड में चलाया जा सकता है, लेकिन स्मार्ट मीटर लगने का मतलब यह नहीं कि हर उपभोक्ता का बिजली कनेक्शन अपने आप प्रीपेड हो गया।

छत्तीसगढ़ की मौजूदा टैरिफ व्यवस्था में स्मार्ट मीटर वाले कुछ LV उपभोक्ताओं के लिए प्रीपेड मोड का प्रावधान मौजूद है और ऐसे प्रीपेड उपभोक्ताओं के लिए ऊर्जा शुल्क पर 1.5% की छूट का भी प्रावधान दर्ज है।

क्या आम उपभोक्ताओं पर अभी प्रीपेड लागू है?

पूरे राज्य के आम घरेलू उपभोक्ताओं के लिए अनिवार्य प्रीपेड व्यवस्था लागू होने की पुष्टि नहीं है।

CSPDCL की मौजूदा व्यवस्था में सामान्य उपभोक्ताओं की बिलिंग जारी है। कंपनी की वेबसाइट पर नियमित उपभोक्ता सेवाओं के साथ अलग प्रीपेड बिलिंग पोर्टल भी उपलब्ध है। इससे यह जरूर पता चलता है कि प्रीपेड तकनीकी व्यवस्था सिस्टम में मौजूद है, लेकिन इसे सभी घरेलू उपभोक्ताओं के लिए अनिवार्य कर दिया गया है, ऐसा नहीं है।

फिर आम लोगों में डर क्यों?

सरकारी कार्यालयों में प्रीपेड व्यवस्था लागू होने और राज्य में स्मार्ट मीटर लगाए जाने के कारण लोगों में यह आशंका बढ़ी है कि अगले चरण में घरेलू बिजली कनेक्शन भी प्रीपेड किए जा सकते हैं।

यह आशंका पूरी तरह बेबुनियाद भी नहीं है, क्योंकि देशभर में बिजली वितरण व्यवस्था को स्मार्ट मीटरिंग और डिजिटल बिलिंग की ओर ले जाने की नीति चल रही है।

छत्तीसगढ़ में भी स्मार्ट मीटर लगाए जा रहे हैं। राज्य सरकार ने स्पष्ट किया है कि ये मीटर तय मानकों के अनुसार लगाए जा रहे हैं और इनका उद्देश्य बिजली व्यवस्था को अधिक पारदर्शी और आधुनिक बनाना है।

लेकिन स्मार्ट मीटर लगाने और सभी उपभोक्ताओं को प्रीपेड करने के बीच एक बड़ा अंतर है।

क्या भविष्य में आम उपभोक्ताओं के लिए प्रीपेड आ सकता है?

संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन अभी कोई समयसीमा घोषित नहीं है।

भविष्य में सरकार यदि प्रीपेड व्यवस्था को आम उपभोक्ताओं तक बढ़ाती है तो इसके लिए अलग दिशा-निर्देश, नियामकीय प्रक्रिया और उपभोक्ता संबंधी नियम स्पष्ट करने होंगे।

खासकर घरेलू उपभोक्ताओं के मामले में यह महत्वपूर्ण होगा कि:

  • रिचार्ज खत्म होने पर कितनी राहत अवधि मिलेगी?
  • रात के समय बिजली काटने की व्यवस्था होगी या नहीं?
  • आपात स्थिति में क्या प्रावधान होगा?
  • गलत मीटर रीडिंग या तकनीकी समस्या पर शिकायत कैसे होगी?
  • उपभोक्ता के खाते में अतिरिक्त राशि का समायोजन कैसे होगा?
  • सब्सिडी और सरकारी राहत योजनाओं का हिसाब कैसे होगा?

इन सवालों का जवाब स्पष्ट किए बिना पूरे राज्य में आम घरेलू उपभोक्ताओं पर प्रीपेड व्यवस्था लागू होने की तारीख बताना जल्दबाजी होगी।

सरकार के लिए सरकारी दफ्तरों से शुरुआत क्यों?

इसका सबसे बड़ा कारण सरकारी विभागों का भारी बिजली बकाया है।

सरकारी विभागों पर हजारों करोड़ रुपए का बिजली बिल लंबित होने के कारण बिजली कंपनी की वसूली प्रभावित हो रही थी। प्रीपेड व्यवस्था से भविष्य में विभाग को पहले ही बजट उपलब्ध कराना होगा और बिजली कंपनी को लंबे समय तक भुगतान का इंतजार नहीं करना पड़ेगा।

यानी सरकार का पहला लक्ष्य बकाया रोकना और सरकारी बिजली खर्च को अनुशासित करना है।

आम उपभोक्ता के लिए अभी क्या स्थिति है?

अभी आम घरेलू उपभोक्ता को हर महीने मिलने वाली सामान्य बिजली बिलिंग व्यवस्था के तहत ही भुगतान करना है।

यदि किसी उपभोक्ता के यहां स्मार्ट मीटर लगाया जा रहा है तो इसका मतलब यह नहीं कि उसे उसी दिन से प्रीपेड रिचार्ज करना पड़ेगा।

स्मार्ट मीटर लगना और प्रीपेड बिलिंग लागू होना दो अलग प्रक्रियाएं हैं।

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